गुरुवार, 29 मार्च, 2007

चुप हूँ तो चुप है आग भड़कने वाली

चुप हूँ तो चुप है आग भड़कने वाली
सुलग रही थी अब तलक, है दहकने वाली

जला के ख़ाक करेगी तुझे भी आतिश ये
मेरे सीने मे क़ैद थी, है बहकने वाली

गम-ए-इज़हार न कर, चमन मे एक तू ही नही
किसी चिड़िया की नन्ही बेटी है चहकने वाली

खिले गुलों से न कर रश्क जो तू हवज़-ए-खार
ये शर्त कब थी हर कली हो महकने वाली

सोमवार, 26 मार्च, 2007

ये कैसी आशिक़ी

ये कैसी आशिक़ी हर दर पे जो बेसब्र हो जाए
मेरा घर आख़िरी मे था, मेरे हिस्से मे क्या आया

पहली मर्तबा छूने से सिहरन दौड़ती है जो
कहीं गुम है न जाने क्यों, छूना भी हुआ ज़ाया

गिरी जो बिजलियाँ छूकर तुझे, मै ही दीवाना था
तेरी बाहें छुएँ मुझको, ढूँढें ग़ैर का साया

तेरे लब पे थे वो किस्से सदा जिनसे ये आती थी
हिक़ायत हो गयी पूरी, तू क्या देगा तू क्या लाया

नही मालूम वो हसरत जो पूरी हो नही पाती
नही मालूम क्या खोया, नही मालूम क्या पाया

शनिवार, 24 मार्च, 2007

विश्व कप क्रिकेट मे हार हमारे ही भले के लिए

(इस लेख के मूल भाव के लिए मै अमिय कान्त जी का आभारी हूँ।)

यदि भारत विश्व कप के अगले दौर मे प्रवेश कर ले तो सोचिये कितना नुक्सान होगा इस देश का।

मैच तो देखने ही पड़ेंगे, उस के लिए रात भर जगना पड़ेगा। नींद तो खराब होगी ही, परिणामस्वरूप जो अगले दिन के कार्य का नुक्सान होगा वो अलग। और फ़ाइनल के नज़दीक पहुँच कर प्रतियोगिता से बाहर होने के बजाय अच्छा है पहले ही घर आ पहुँचे। बाद के मैचों मे जो टेन्शन होती है उससे तो बच जाएँगे - खिलाड़ी भी, और दर्शक भी। कई लोगों को दिल का दौरा भी नही पड़ेगा।

आप कहेंगे कि विश्व कप जीत भी तो सकते थे। शायद, हाँ। मगर ज़रा रैशनली सोचिये; विश्व कप जीतना अधिक लाभप्रद है या करोड़ों लोगों की नींद। भारत-पाकिस्तान जब आपस मे खेलते हैं तब भी तो उतना ही आनंद आता है। अब जब दोनों बाहर हो गए हैं, तो नौ-दस मैचों की श्रॄंखला आपस मे खेल लें। यहीं कहीं - क्वाला-लामपुर से शारजाह के बीच कहीं पर। क्रिकेट का मज़ा भी होगा और चैन की नींदें भी।

पाकिस्तान की टीम ने अपने देश के नागरिकों का ख्याल रखने मे कोई चान्स नही लिया। जो मिला उसी से हार लिये, चाहे मुक़ाबला आयरलैंड से ही क्यों न रहा हो।

समस्या थी ग्रुप बी मे। आई सी सी ने मानो एक साजिश के तहत दक्षिण एशिया के तीन देशों को आमने-सामने कर दिया - भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश। किसी न किसी को तो अगले राउन्ड मे जाना ही पड़ेगा। और साथ मे किसे रखा इन तीनों के? बर्म्यूडा को। जिसके खिलाफ़ हमारे खिलाड़ी भी ४०० रन बना लेते हैं। मतलब, कितना भी जतन कर लो दक्षिण एशिया की दो टीमों को तो अगले राउन्ड मे जाना ही पड़ेगा। बड़ी असमंजस वाली स्थिति हो गयी ये तो! निश्चित रूप से तीनों देशों के क्रिकेटरों ने मिलकर समस्या पर गहन चिंतन और गम्भीर चर्चा की होगी। हर टीम को अपने दर्शक प्रिय होते हैं, तो उनकी नींदें खराब न होने दी जाएँ, इसके लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा। बर्म्यूडा के रहते हुए तो एक टीम ही अपने देश का भला कर सकती थी। कैसे चयन करें उस टीम का?

अवश्य ही उन लोगों ने जौन स्टुआर्ट मिल के यूटिलिटेरियन सिद्धांत का सहारा लिया होगा। जो ऐसे अवसरों मे प्रयोग के लिए सर्वथा उपयुक्त है। इस सिद्धांत के प्रकाश मे यह तय करना था कि किस टीम के बाहर होने से "ग्रेटेस्ट गुड ऒफ़ ग्रेटेस्ट नम्बर" होगा। अब समस्या का हल साफ़ नज़र आता है। भारत के बाहर होने से कहीं ज़्यादा लोग चैन की नींद सो पाएँगे। इतनी बड़ी आबादी जो ठहरी।

अब आप समझ गए होंगे क्यों भारत विश्व कप से बाहर होने की कगार पर आ गया है। बांग्लादेश वाले अगर मिल का सिद्धांत भुला कर स्वार्थी हो जाएँ (और बर्म्यूडा से हार जाएँ) तो अलग बात है।

हमारे ही भले की बात है।

मंगलवार, 20 मार्च, 2007

किसी ने कब्र मे मेरे मुझे दफ़ना दिया, देखो

किसी ने कब्र मे मेरे मुझे दफ़ना दिया, देखो
न मुझको साँस आती है न जन्नत का नज़ारा है

बहुत मायूस हूँ कि झूठी अफ़वाहें थी इतनी वो
गमों का साथ भी है और न मरने का सहारा है

हर एक रंगीन महफ़िल मे मेरा क़ातिल भी है शामिल
बहुत मुश्किल है ये कहना खुदा को कौन प्यारा है

मंगलवार, 13 मार्च, 2007

तेरा नाम लेकर मौत का वो जश्‍न करते हैं

तेरा नाम लेकर मौत का वो जश्‍न करते हैं
मगर तू मर चुका, अच्छी तरह से जानते हैं वो

जब तू नही तब क्या करें मन्दिर-औ-मस्जिद का
इमारत बेवज़ह जो तोड़ने की ठानते हैं वो

मासूमों के मरने से किसी मज़हब को क्या हासिल
ज़रा हम भी सुनें कि दीन किस को मानते हैं वो

बुधवार, 7 मार्च, 2007

नज़र आने के भी अन्दाज़ और आदाब होते हैं

नुमाइश देखकर ताली बजाना ठीक है लेकिन
वो कोई और होते हैं जो अहल-ए-ख़्वाब होते हैं

अगर ढाँके न उसको अब्र, तो फ़िर बिजलियाँ कैसी
नज़र आने के भी अन्दाज़ और आदाब होते हैं

पहाड़ों के हलक से आग आयी है, करें क्या हम
हमे ये फ़िक्र सीने मे निहां सैलाब होते हैं

सोमवार, 5 मार्च, 2007

हकीकत जानता हूँ फिर भी धोखे खा रहा हूँ मै

बिस्मिल हूँ बला का, मुकद्दर आजमा रहा हूँ मै
हकीकत जानता हूँ फिर भी धोखे खा रहा हूँ मै

लेकर नाम मज़हब का मरे कई मर्तबा कितने
ये मसला ज़ाती है, खुद को ये समझा रहा हूँ मै

सड़क है या कोई क़ातिल जो इतनी जानें लेती है
मुझे दफ़्तर जो जाना है इसी पे जा रहा हूँ मै

सुना है कोक मे ऐसा है कुछ जो ज़हर जैसा है
उसे खरीदता हूँ और पीता जा रहा हूँ मै

सभी अख़बार मे बेकार की बातें ही छपती हैं
वाकिफ़ हूँ, हुई मुद्दत मगर पढ़ता रहा हूँ मै

मेरे हर ज़िक्र मे वो, वो मेरी तौहीन करते हैं
जाने क्या खुमारी, उनके पीछे जा रहा हूँ मै

हुई फ़ुर्कत, हुआ तनहा, मगर अब भी दीवाना हूँ
मोहब्बत की है क्या तासीर, ये दिखला रहा हूँ मै

जीने को ज़रूरी है कि पूरा सच न देखें हम
कभी जगता रहा हूँ तो कभी सोता रहा हूँ मै