(इस लेख के मूल भाव के लिए मै अमिय कान्त जी का आभारी हूँ।)
यदि भारत विश्व कप के अगले दौर मे प्रवेश कर ले तो सोचिये कितना नुक्सान होगा इस देश का।
मैच तो देखने ही पड़ेंगे, उस के लिए रात भर जगना पड़ेगा। नींद तो खराब होगी ही, परिणामस्वरूप जो अगले दिन के कार्य का नुक्सान होगा वो अलग। और फ़ाइनल के नज़दीक पहुँच कर प्रतियोगिता से बाहर होने के बजाय अच्छा है पहले ही घर आ पहुँचे। बाद के मैचों मे जो टेन्शन होती है उससे तो बच जाएँगे - खिलाड़ी भी, और दर्शक भी। कई लोगों को दिल का दौरा भी नही पड़ेगा।
आप कहेंगे कि विश्व कप जीत भी तो सकते थे। शायद, हाँ। मगर ज़रा रैशनली सोचिये; विश्व कप जीतना अधिक लाभप्रद है या करोड़ों लोगों की नींद। भारत-पाकिस्तान जब आपस मे खेलते हैं तब भी तो उतना ही आनंद आता है। अब जब दोनों बाहर हो गए हैं, तो नौ-दस मैचों की श्रॄंखला आपस मे खेल लें। यहीं कहीं - क्वाला-लामपुर से शारजाह के बीच कहीं पर। क्रिकेट का मज़ा भी होगा और चैन की नींदें भी।
पाकिस्तान की टीम ने अपने देश के नागरिकों का ख्याल रखने मे कोई चान्स नही लिया। जो मिला उसी से हार लिये, चाहे मुक़ाबला आयरलैंड से ही क्यों न रहा हो।
समस्या थी ग्रुप बी मे। आई सी सी ने मानो एक साजिश के तहत दक्षिण एशिया के तीन देशों को आमने-सामने कर दिया - भारत, श्रीलंका और बांग्लादेश। किसी न किसी को तो अगले राउन्ड मे जाना ही पड़ेगा। और साथ मे किसे रखा इन तीनों के? बर्म्यूडा को। जिसके खिलाफ़ हमारे खिलाड़ी भी ४०० रन बना लेते हैं। मतलब, कितना भी जतन कर लो दक्षिण एशिया की दो टीमों को तो अगले राउन्ड मे जाना ही पड़ेगा। बड़ी असमंजस वाली स्थिति हो गयी ये तो! निश्चित रूप से तीनों देशों के क्रिकेटरों ने मिलकर समस्या पर गहन चिंतन और गम्भीर चर्चा की होगी। हर टीम को अपने दर्शक प्रिय होते हैं, तो उनकी नींदें खराब न होने दी जाएँ, इसके लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा। बर्म्यूडा के रहते हुए तो एक टीम ही अपने देश का भला कर सकती थी। कैसे चयन करें उस टीम का?
अवश्य ही उन लोगों ने जौन स्टुआर्ट मिल के यूटिलिटेरियन सिद्धांत का सहारा लिया होगा। जो ऐसे अवसरों मे प्रयोग के लिए सर्वथा उपयुक्त है। इस सिद्धांत के प्रकाश मे यह तय करना था कि किस टीम के बाहर होने से "ग्रेटेस्ट गुड ऒफ़ ग्रेटेस्ट नम्बर" होगा। अब समस्या का हल साफ़ नज़र आता है। भारत के बाहर होने से कहीं ज़्यादा लोग चैन की नींद सो पाएँगे। इतनी बड़ी आबादी जो ठहरी।
अब आप समझ गए होंगे क्यों भारत विश्व कप से बाहर होने की कगार पर आ गया है। बांग्लादेश वाले अगर मिल का सिद्धांत भुला कर स्वार्थी हो जाएँ (और बर्म्यूडा से हार जाएँ) तो अलग बात है।
हमारे ही भले की बात है।