सोमवार, 5 मार्च, 2007

हकीकत जानता हूँ फिर भी धोखे खा रहा हूँ मै

बिस्मिल हूँ बला का, मुकद्दर आजमा रहा हूँ मै
हकीकत जानता हूँ फिर भी धोखे खा रहा हूँ मै

लेकर नाम मज़हब का मरे कई मर्तबा कितने
ये मसला ज़ाती है, खुद को ये समझा रहा हूँ मै

सड़क है या कोई क़ातिल जो इतनी जानें लेती है
मुझे दफ़्तर जो जाना है इसी पे जा रहा हूँ मै

सुना है कोक मे ऐसा है कुछ जो ज़हर जैसा है
उसे खरीदता हूँ और पीता जा रहा हूँ मै

सभी अख़बार मे बेकार की बातें ही छपती हैं
वाकिफ़ हूँ, हुई मुद्दत मगर पढ़ता रहा हूँ मै

मेरे हर ज़िक्र मे वो, वो मेरी तौहीन करते हैं
जाने क्या खुमारी, उनके पीछे जा रहा हूँ मै

हुई फ़ुर्कत, हुआ तनहा, मगर अब भी दीवाना हूँ
मोहब्बत की है क्या तासीर, ये दिखला रहा हूँ मै

जीने को ज़रूरी है कि पूरा सच न देखें हम
कभी जगता रहा हूँ तो कभी सोता रहा हूँ मै

5 टिप्पणिया॑:

Jitendra Chaudhary ने कहा…

सुना है कोक मे ऐसा है कुछ जो ज़हर जैसा है
उसे खरीदता हूँ और पीता जा रहा हूँ मै

सभी अख़बार मे बेकार की बातें ही छपती हैं
वाकिफ़ हूँ, हुई मुद्दत मगर पढ़ता रहा हूँ मै


ये बहुत अच्छी लगी। बहुत सही।

उडन तश्तरी ने कहा…

हर शेर पूरा है कमाल का.

सड़क है या कोई क़ातिल जो इतनी जानें लेती है
मुझे दफ़्तर जो जाना है इसी पे जा रहा हूँ मै


--बहुत खूब!!

लिखते रहें. हमारे टुन्नू मियां भी पढ़कर खुश हुये! :)

अनूप शुक्ला ने कहा…

बहुत अच्छे। शायरी पर आगे हाथ साफ़ करते रहो भाई!
हुई फ़ुर्कत, हुआ तनहा, मगर अब भी दीवाना हूँ
मोहब्बत की है क्या तासीर, ये दिखला रहा हूँ मै

ये तासीर दिखाते रहो!

Divine India ने कहा…

भाई कमाल के शेर लिखा है संदेशों के तोह्फे के साथ… वो कहते हैं न की जागा इंसान अगर सोया है तो उसे जगाना नामुमकिन हैं…।

manya ने कहा…

aapane kaha to badhiyaa hai hi.. saath hi jo sandesh diye hain .. wo bhi kaabil-e-taarif hain.. hum sach jaanate hain fir bhi wahi karte hn .. shyad yahi bada sach hai..